कमरे की खिड़की धड़ाम से खुली और ठंडी हवा के झोंके ने जलती हुई मोमबत्ती को बुझा दिया। दीवार पर मंडराता हुआ वह साया एक पल के लिए थमा और फिर तेजी से छत की ओर जाने वाले जीने की तरफ बढ़ा। मेरे हाथों में कंपन था, लेकिन भय पर जिज्ञासा हावी हो चुकी थी। मैं अपनी टॉर्च जलाकर उस साए के पीछे भागा। सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मुझे किसी के दबे पांव चलने की आहट साफ सुनाई दे रही थी। जैसे ही मैं हवेली की खुली छत पर पहुंचा, सामने गंगा का शांत पाट फैला हुआ था। अस्सी घाट की बत्तियां दूर टिमटिमा रही थीं। छत के मुंडेर के पास सफेद सूती साड़ी पहने एक बुजुर्ग महिला खड़ी थी। उनके सफेद बाल हवा में उड़ रहे थे और वे कांपते हाथों से गंगा की लहरों को देख रही थीं। मैंने टॉर्च की रोशनी उनकी तरफ की, तो उन्होंने अपना चेहरा ढक लिया। उनकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक असीम वेदना थी। "टॉर्च बुझा दो, कबीर... तुम्हारी आँखों की ये चमक बिल्कुल तुम्हारे दादाजी शैलेंद्र जैसी है। मैं तुम्हें कोई नुकसान पहुँचाने नहीं आई हूँ।" उनकी आवाज में एक ऐसा अपनत्व...
दिसंबर के महीने में शिमला की सर्द हवाएं जिस्म को कपा देने वाली होती हैं। मैं अपने नए उपन्यास को लिखने के लिए एक शांत और एकांत जगह की तलाश में था। शहर के शोर से दूर, पहाड़ों की गोद में बना 'पाइन व्यू विला' मुझे पहली ही नजर में पसंद आ गया था। ब्रिटिश काल की बनी इस जर्जर लेकिन खूबसूरत हवेली के मालिक ने मुझे बहुत ही कम किराए पर इसे दे दिया था। इस विला के साथ केवल एक ही शर्त थी—वहाँ का बूढ़ा केयरटेकर, हरीराम, जो हवेली के पिछले हिस्से में रहता था और रात 8 बजे के बाद मुख्य हवेली की तरफ नहीं आता था। शुरुआती दो दिन बेहद शांत गुजरे। दिन भर बर्फबारी होती और रात को आग के पास बैठकर लिखना मुझे एक अलग ही दुनिया में ले जाता था। लेकिन तीसरे दिन की रात को कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे भीतर एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी। रात के करीब दो बजे, जब पूरा शिमला गहरी नींद में सोया हुआ था, मुझे अपने कमरे के ठीक ऊपर बने बंद अटारी (Attic) से किसी के चलने की धीमी आवाज सुनाई दी। लकड़ी के फर्श पर होने वाली वो आहटें बहुत ही धीमी और संभली हुई थीं, मानो कोई जानबूझकर दबे पांव चल ...