Skip to main content

Posts

धुंधला अतीत (भाग-2): हवेली का अंतिम सच और एक अधूरा रिश्ता (सच्ची घटना का अंत)

कमरे की खिड़की धड़ाम से खुली और ठंडी हवा के झोंके ने जलती हुई मोमबत्ती को बुझा दिया। दीवार पर मंडराता हुआ वह साया एक पल के लिए थमा और फिर तेजी से छत की ओर जाने वाले जीने की तरफ बढ़ा। मेरे हाथों में कंपन था, लेकिन भय पर जिज्ञासा हावी हो चुकी थी। मैं अपनी टॉर्च जलाकर उस साए के पीछे भागा। सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मुझे किसी के दबे पांव चलने की आहट साफ सुनाई दे रही थी। जैसे ही मैं हवेली की खुली छत पर पहुंचा, सामने गंगा का शांत पाट फैला हुआ था। अस्सी घाट की बत्तियां दूर टिमटिमा रही थीं। छत के मुंडेर के पास सफेद सूती साड़ी पहने एक बुजुर्ग महिला खड़ी थी। उनके सफेद बाल हवा में उड़ रहे थे और वे कांपते हाथों से गंगा की लहरों को देख रही थीं। मैंने टॉर्च की रोशनी उनकी तरफ की, तो उन्होंने अपना चेहरा ढक लिया। उनकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक असीम वेदना थी। "टॉर्च बुझा दो, कबीर... तुम्हारी आँखों की ये चमक बिल्कुल तुम्हारे दादाजी शैलेंद्र जैसी है। मैं तुम्हें कोई नुकसान पहुँचाने नहीं आई हूँ।" उनकी आवाज में एक ऐसा अपनत्व...
Recent posts

खामोश आहटें: शिमला के उस सुनसान विला और एक पुरानी डायरी का खौफनाक सच

दिसंबर के महीने में शिमला की सर्द हवाएं जिस्म को कपा देने वाली होती हैं। मैं अपने नए उपन्यास को लिखने के लिए एक शांत और एकांत जगह की तलाश में था। शहर के शोर से दूर, पहाड़ों की गोद में बना 'पाइन व्यू विला' मुझे पहली ही नजर में पसंद आ गया था। ब्रिटिश काल की बनी इस जर्जर लेकिन खूबसूरत हवेली के मालिक ने मुझे बहुत ही कम किराए पर इसे दे दिया था। इस विला के साथ केवल एक ही शर्त थी—वहाँ का बूढ़ा केयरटेकर, हरीराम, जो हवेली के पिछले हिस्से में रहता था और रात 8 बजे के बाद मुख्य हवेली की तरफ नहीं आता था। शुरुआती दो दिन बेहद शांत गुजरे। दिन भर बर्फबारी होती और रात को आग के पास बैठकर लिखना मुझे एक अलग ही दुनिया में ले जाता था। लेकिन तीसरे दिन की रात को कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे भीतर एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी। रात के करीब दो बजे, जब पूरा शिमला गहरी नींद में सोया हुआ था, मुझे अपने कमरे के ठीक ऊपर बने बंद अटारी (Attic) से किसी के चलने की धीमी आवाज सुनाई दी। लकड़ी के फर्श पर होने वाली वो आहटें बहुत ही धीमी और संभली हुई थीं, मानो कोई जानबूझकर दबे पांव चल ...

धुंधला अतीत: बनारस के उस पुराने घाट और एक अधूरी चिट्ठी का रहस्य (सच्ची घटना पर आधारित)

गंगा की लहरों पर तैरते दीयों की रोशनी और घाटों पर गूंजती आरती की आवाजें अमूमन मन को सुकून देती हैं। लेकिन बनारस के अस्सी घाट के उस कोने में बनी वह जर्जर हवेली, मेरे लिए सुकून नहीं, बल्कि एक अनसुलझा सवाल बन चुकी थी। मेरा नाम कबीर है। पेशे से मैं एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ और दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी में व्यस्त था। लेकिन पिछले महीने जब दादाजी का देहांत हुआ, तो मुझे वसीयत और घर के रख-रखाव के सिलसिले में अपने पैतृक शहर बनारस लौटना पड़ा। दादाजी के जाने का गम तो था ही, लेकिन इस पुश्तैनी हवेली में अकेले रहना उस गम को और गहरा कर रहा था। कमरों की दीवारों पर जमी धूल और पुरानी तस्वीरों की खामोशी मानो मुझसे कुछ कहना चाहती थीं। एक शाम, जब मैं दादाजी के कमरे की सफाई कर रहा था, तो मेरी नजर अलमारी के सबसे ऊपरी हिस्से पर पड़ी। वहाँ गहरे कत्थई रंग का एक पुराना सागौन का संदूक रखा था। उस पर पीतल का एक भारी ताला लटका था, जिसकी चाबी मुझे दादाजी के अंतिम समय के सामान से मिली थी। एक पुराना संदूक और वो पीली पड़ चुकी चिट्ठी मैंने कांपते हाथों से ताला...

बंद कमरे का रहस्य: देवदार विला का आखिरी सच (भाग 3 - क्लाइमैक्स) | Hindi Suspense Story

पिछले भाग में आपने पढ़ा: आरव को देवदार विला के तहखाने में अपनी मृत दादी गायत्री की एक मोम की मूर्ति और अपने दादाजी के पश्चाताप भरे खत मिलते हैं। वह जान जाता है कि दादी की मौत आग के हादसे में हुई थी। तभी अचानक म्यूजिक बॉक्स की धुन अजीब हो जाती है, दीवार पर एक रहस्यमयी परछाई उभरती है, आरव के कान में कोई फुसफुसाता है और तहखाने का दरवाजा बंद हो जाता है... तहखाने के घने अंधेरे में आरव की सांसें तेज हो गईं। घबराहट के मारे उसका गला सूख रहा था। उसने अपने फोन की टॉर्च जलाने की कोशिश की, लेकिन अजीब बात थी कि उसका फोन पूरी तरह से बंद हो चुका था, मानो उसकी सारी ऊर्जा किसी अदृश्य शक्ति ने सोख ली हो। अंधेरे में जलती एक अलौकिक लौ तभी, उस खामोशी और घने अंधेरे के बीच, मोम की मूर्ति के ठीक सामने एक नन्ही सी रोशनी तैरने लगी। वह कोई आम रोशनी नहीं थी—वह एक सुनहरी, गुनगुनी और बेहद शांत कर देने वाली आभा थी। धीरे-धीरे उस रोशनी ने एक स्त्री का रूप ले लिया। आरव के सामने उसकी दादी, गायत्री का साया खड़ा था। आरव का डर अब धीरे-धीरे कम होने लगा था। उस साए की आँखों में कोई खौफ नही...

बंद कमरे का रहस्य: देवदार विला की एक अधूरी दास्तां (भाग 2) | Hindi Suspense Story

पिछले भाग में आपने पढ़ा: आरव अपने दादाजी के निधन के बाद उनके पुराने बंगले 'देवदार विला' आता है। उसे सपने में लाल साड़ी वाली एक रहस्यमयी स्त्री दिखती है, जिसकी अधूरी पेंटिंग उसे घर की अटारी में मिलती है। दादाजी की चेतावनी के बावजूद, आधी रात को तहखाने से आती सुरीली धुन सुनकर आरव वहाँ जाता है और जैसे ही वह दरवाजा खोलता है, कमरे के बीचों-बीच रखी कुर्सी धीरे-धीरे उसकी तरफ घूमने लगती है... जैसे ही वह कुर्सी पूरी तरह घूमी, आरव की सांसें थम गईं। टॉर्च की कांपती हुई पीली रोशनी उस आकृति के चेहरे पर पड़ी। आरव को उम्मीद थी कि वहाँ कोई भयानक परछाई या कोई अजनबी होगा, लेकिन सामने जो था, उसने उसके पैरों तले से जमीन खिसका दी। एक बेजान चेहरा और जीती-जागती यादें कुर्सी पर कोई जीवित इंसान नहीं, बल्कि मोम (Wax) से बनी एक बेहद खूबसूरत और आदमकद मूर्ति बैठी हुई थी। वह मूर्ति हुबहू उसी लाल साड़ी वाली महिला की थी जिसे आरव ने अपने सपनों में और उस अधूरी पेंटिंग में देखा था। मूर्ति की आँखें इतनी सजीव थीं कि लग रहा था वे अभी पलकें झपका देंगी। उसके हाथों में पीतल का एक पुराना...

बंद कमरे का रहस्य: देवदार विला की एक अधूरी दास्तां (भाग 1) | Suspense Hindi Story

जिंदगी में कुछ दरवाजे ऐसे होते हैं, जिन्हें कभी खोला नहीं जाना चाहिए। लेकिन क्या होगा जब आपके अपनों की यादें और अतीत की कोई अनसुलझी पहेली आपको उसी बंद दरवाजे की तरफ खींचने लगे? आज की यह कहानी एक ऐसे ही सफर की है, जहाँ डर और बेपनाह मोहब्बत के बीच की लकीर बहुत धुंधली हो जाती है। "वक्त बीत जाता है, इंसान चले जाते हैं... पर उनकी खामोशियां घरों के कोनों में सिसकियों की तरह हमेशा जिंदा रहती हैं।" यादों की छांव और सूना घर शिमला की बर्फीली हवाएं जब चेहरे को छूती थीं, तो आरव को अपने दादाजी की बहुत याद आती थी। आरव एक जाना-माना चित्रकार (Artist) था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसके कैनवास खाली पड़े थे। दिल में एक अजीब सा खालीपन था। दादाजी देवराज के अचानक निधन के बाद, आरव को उनके पुराने बंगले 'देवदार विला' की चाबियां मिली थीं। देवदार विला शिमला के एक सुनसान छोर पर देवदार के घने पेड़ों के बीच घिरा हुआ था। जब आरव वहाँ पहुँचा, तो धूल और सन्नाटे ने उसका स्वागत किया। वह बचपन में यहाँ आया करता था, जब यह घर हंसी-मजाक और दादाजी की कहानियों से गूंजता था। ल...

खूनी हवेली और वो 'नौटंकी' भूत: शैतान का अंत (अंतिम भाग 5) | Horror Comedy Finale

पिछले भाग में कहानी एक महा-सस्पेंस पर रुकी थी, जहाँ पाताल का 500 साल पुराना शैतान 'कंकालासुर' कहर बरपाने के लिए पूरी तरह बाहर आ चुका था। उसे हराने वाली जादुई भस्म (राख) खूनी संदूक में थी, और संदूक को खोलने की चाबी (परदादा की तांबे की अंगूठी) को हमारा भुक्खड़ समोसा 'हाजमोला' समझकर खा चुका था! अब रमेश के सामने मौत खड़ी थी और चाबी समोसा के पेट में थी। अध्याय 17: पेट में चाबी, सिर पर मौत कंकालासुर ने अपनी लाल धधकती आँखों से रमेश को घूरा और ज़ोर से हँसा। उसकी हँसी से तहखाने की बची-खुची दीवारें भी दरकने लगीं। "हा हा हा! मूर्ख इंसानों! तुम्हारी चाबी तो पेट में पच रही है। अब तुम्हें कौन बचाएगा?" रमेश ने हताश होकर नटवरलाल (भूत) की तरफ देखा, "भाई नटवरलाल! तुम तो भूत हो, दीवार के आर-पार जा सकते हो। अपना हाथ समोसा के पेट में डालकर वो अंगूठी निकाल लाओ ना!" नटवरलाल ने डरते हुए कहा, "पागल है क्या? मैं भूत हूँ, डॉक्टर नहीं! और इसके पेट में जो खतरनाक गैस बन रही है ना, उससे मेरी बची-खुची आत्मा भी पिघल जाएगी!" समोस...