जैसे ही वह कुर्सी पूरी तरह घूमी, आरव की सांसें थम गईं। टॉर्च की कांपती हुई पीली रोशनी उस आकृति के चेहरे पर पड़ी। आरव को उम्मीद थी कि वहाँ कोई भयानक परछाई या कोई अजनबी होगा, लेकिन सामने जो था, उसने उसके पैरों तले से जमीन खिसका दी।
एक बेजान चेहरा और जीती-जागती यादें
कुर्सी पर कोई जीवित इंसान नहीं, बल्कि मोम (Wax) से बनी एक बेहद खूबसूरत और आदमकद मूर्ति बैठी हुई थी। वह मूर्ति हुबहू उसी लाल साड़ी वाली महिला की थी जिसे आरव ने अपने सपनों में और उस अधूरी पेंटिंग में देखा था। मूर्ति की आँखें इतनी सजीव थीं कि लग रहा था वे अभी पलकें झपका देंगी। उसके हाथों में पीतल का एक पुराना म्यूजिक बॉक्स था, जिससे वही सुरीली धुन धीमी आवाज में बज रही थी।
जैसे ही आरव थोड़ा और पास गया, उसे दिखाई दिया कि उस मूर्ति के गले में एक सोने का लॉकेट था। आरव ने थरथराते हाथों से उस लॉकेट को छुआ और उसे खोला। लॉकेट के भीतर दो छोटी तस्वीरें थीं—एक उसके दादाजी देवराज की जवानी की तस्वीर थी, और दूसरी उस महिला की। नीचे बारीक अक्षरों में लिखा था: "गायत्री - मेरी आखिरी सांस तक।"
गायत्री का अतीत: एक दर्दनाक सच
आरव ने गहरी सांस ली। गायत्री! यह उसकी दादी थीं, जिन्हें उसने कभी नहीं देखा था। परिवार में हमेशा यही बताया गया था कि आरव के जन्म से पहले ही उसकी दादी का निधन हो गया था, लेकिन उनकी मौत कैसे हुई, इस पर हमेशा चुप्पी साध ली जाती थी।
उस सीलन भरे कमरे के कोने में रखी एक पुरानी संदूक की ओर आरव के कदम बढ़े। संदूक बिना ताले के थी। जब उसने उसे खोला, तो उसमें धूल से सने हुए खत मिले। ये खत देवराज ने गायत्री को लिखे थे। आरव ने एक खत उठाया और पढ़ने लगा। खतों के शब्द दर्द और पश्चाताप से भीगे हुए थे।
उन खतों से जो सच सामने आया, उसने आरव के दिल को झकझोर कर रख दिया। करीब तीस साल पहले, शिमला की एक बर्फीली रात में देवदार विला में भीषण आग लगी थी। उस वक्त आरव के पिता बहुत छोटे थे। गायत्री ने अपनी जान दांव पर लगाकर अपने इकलौते बेटे (आरव के पिता) को तो बचा लिया, लेकिन वह खुद उस आग की लपटों से बाहर नहीं निकल सकीं।
कलाकार का अधूरा पश्चाताप
दादाजी देवराज खुद को कभी माफ नहीं कर पाए। अपनी पत्नी को खोने के गम में वे धीरे-धीरे पागलपन की हद तक चले गए। उन्होंने गायत्री की यादों को जिंदा रखने के लिए इस तहखाने में उनकी यह मोम की मूर्ति बनाई थी। वे हर रात यहाँ आकर बैठते थे और घंटों अपनी मृत पत्नी से बातें करते थे।
अटारी में जो आधी बनी पेंटिंग थी, वह दादाजी का आखिरी प्रयास था गायत्री को अमर बनाने का। लेकिन हर बार जब वे उनके चेहरे को पूरा करने की कोशिश करते, तो उनके हाथ कांपने लगते और उनकी आँखों से बहते आंसू कैनवास पर गिर जाते। यही वजह थी कि उस पेंटिंग की आँखों के नीचे का हिस्सा हमेशा गीला महसूस होता था, क्योंकि वह कोई अलौकिक शक्ति नहीं, बल्कि एक टूटे हुए पति के आंसुओं के निशान थे जो कभी सूखे ही नहीं थे।
यह सब जानकर आरव की आँखों से आंसू बहने लगे। डर का स्थान अब एक गहरे, असीम दुख ने ले लिया था। वह अपनी दादी की मूर्ति के सामने घुटनों के बल बैठ गया। "दादाजी... आपका दर्द कितना बड़ा था, और आप इसे अकेले ही सहते रहे," उसने बुदबुदाते हुए कहा।
लेकिन संगीत किसने बजाया?
तभी अचानक आरव के दिमाग में एक खतरनाक सवाल कौंधा। अगर यह सिर्फ एक बेजान मोम की मूर्ति है, और दादाजी अब इस दुनिया में नहीं हैं... तो आज रात ठीक बारह बजकर पांच मिनट पर यह म्यूजिक बॉक्स किसने चालू किया?
जैसे ही यह विचार उसके मन में आया, तहखाने की हवा अचानक बर्फ से भी ज्यादा ठंडी हो गई। मोमबत्ती की लौ पीली से हल्की नीली होने लगी। म्यूजिक बॉक्स की सुरीली धुन अचानक विकृत (Distorted) होकर धीमी और डरावनी हो गई, मानो कोई रो रहा हो।
तभी आरव को महसूस हुआ कि कमरे की दीवार पर उसकी अपनी परछाई के ठीक बगल में एक और परछाई धीरे-धीरे उभर रही है। वह परछाई मोम की मूर्ति की नहीं थी, क्योंकि मूर्ति तो स्थिर बैठी थी। वह परछाई धीरे-धीरे हाथ उठाकर आरव के कंधे की तरफ बढ़ रही थी।
आरव का शरीर डर के मारे सुन्न पड़ गया। उसने मुड़ने की कोशिश की, लेकिन उसका शरीर जैसे जमीन से चिपक गया था। तभी उसके कानों के बिल्कुल पास एक ठंडी, कांपती हुई फुसफुसाहट गूंजी: "आरव... तुमने मुझे ढूंढ ही लिया..."
एक झटके के साथ तहखाने का भारी लोहे का दरवाजा पीछे से बंद हो गया और पूरी तरह से अंधेरा छा गया।
क्या वह सचमुच गायत्री की आत्मा थी? या देवदार विला में कोई और भी छिपा है जो इस परिवार को तबाह करना चाहता है?
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