जिंदगी में कुछ दरवाजे ऐसे होते हैं, जिन्हें कभी खोला नहीं जाना चाहिए। लेकिन क्या होगा जब आपके अपनों की यादें और अतीत की कोई अनसुलझी पहेली आपको उसी बंद दरवाजे की तरफ खींचने लगे? आज की यह कहानी एक ऐसे ही सफर की है, जहाँ डर और बेपनाह मोहब्बत के बीच की लकीर बहुत धुंधली हो जाती है।
यादों की छांव और सूना घर
शिमला की बर्फीली हवाएं जब चेहरे को छूती थीं, तो आरव को अपने दादाजी की बहुत याद आती थी। आरव एक जाना-माना चित्रकार (Artist) था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसके कैनवास खाली पड़े थे। दिल में एक अजीब सा खालीपन था। दादाजी देवराज के अचानक निधन के बाद, आरव को उनके पुराने बंगले 'देवदार विला' की चाबियां मिली थीं।
देवदार विला शिमला के एक सुनसान छोर पर देवदार के घने पेड़ों के बीच घिरा हुआ था। जब आरव वहाँ पहुँचा, तो धूल और सन्नाटे ने उसका स्वागत किया। वह बचपन में यहाँ आया करता था, जब यह घर हंसी-मजाक और दादाजी की कहानियों से गूंजता था। लेकिन आज, इस विशाल बंगले का हर कोना जैसे रो रहा था।
सपनों की धुंधली परछाई
विगत कुछ हफ़्तों से आरव को एक ही सपना बार-बार आ रहा था। सपने में उसे एक धुंधली सी परछाई दिखाई देती थी—लाल साड़ी पहने एक स्त्री, जो देवदार विला के पिछले बगीचे में खड़ी होकर रो रही होती थी। वह आरव को अपने पास बुलाती थी, लेकिन जैसे ही आरव आगे बढ़ता, उसकी आँख खुल जाती थी।
आरव को लगा कि यह केवल उसका वहम है। मगर जब उसने पहले दिन बंगले के लिविंग रूम में कदम रखा, तो उसे वही चिर-परिचित खुशबू महसूस हुई—गीली मिट्टी और चमेली के फूलों की मिली-जुली महक, ठीक वही जो उसे सपने में आया करती थी। आरव के रोंगटे खड़े हो गए। क्या इस सूने घर में कोई और भी था?
अटारी में छिपा रहस्यमयी कैनवास
अपने खालीपन को दूर करने और दादाजी के अतीत को समझने के लिए आरव ने घर की अटारी (Attic) को साफ करने का फैसला किया। पुरानी किताबों, टूटे हुए फर्नीचर और यादों के मलबे के बीच, उसकी नजर एक विशाल फ्रेम पर पड़ी जो काले रंग के रेशमी कपड़े से ढकी हुई थी।
कौतूहलवश, आरव ने उस कपड़े को हटाया। सामने जो था, उसे देखकर उसके हाथ कांपने लगे। वह एक तैलचित्र (Oil Painting) था—एक बेहद खूबसूरत औरत का, जिसने लाल रंग की साड़ी पहनी थी। उसकी आँखें इतनी सजीव थीं मानो वे सीधे आरव के दिल में झांक रही हों। लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि पेंटिंग में महिला का चेहरा आधा ही बना हुआ था, बाकी का आधा हिस्सा अंधेरे में डूबा था।
जैसे ही आरव ने उस पेंटिंग पर अपनी उंगलियां फेरीं, उसे महसूस हुआ कि पेंटिंग के कैनवास पर बनी उस स्त्री की आँखों के नीचे का हिस्सा हल्का गीला था। मानो वह अभी-अभी रोई हो। आरव ने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया। "क्या एक बेजान पेंटिंग भी रो सकती है?" उसने खुद से पूछा।
दादाजी की डायरी और वह चेतावनी
उसी पेंटिंग के ठीक पीछे आरव को चमड़े की जिल्द वाली दादाजी की एक पुरानी डायरी मिली। डायरी के पन्ने पीले पड़ चुके थे। आरव ने पन्नों को पलटना शुरू किया। शुरुआत के पन्नों में रोजमर्रा की बातें थीं, लेकिन आखिरी पन्नों तक आते-आते लिखावट बहुत अशांत और डरी हुई लगने लगी थी।
मौत से ठीक दो दिन पहले वाले पन्ने पर दादाजी ने लिखा था:
"आरव... बेटा, मुझे माफ कर देना। मैंने तुमसे और इस दुनिया से एक बहुत बड़ा सच छुपाया। देवदार विला सिर्फ एक घर नहीं है, यह एक पिंजरा है। अगर तुम कभी यहाँ आओ, तो तहखाने (Basement) की तरफ कभी मत जाना। वहाँ उस बंद कमरे में एक ऐसी सच्चाई कैद है, जो हमारे पूरे खानदान को तबाह कर सकती है। रात के बारह बजे के बाद उस कमरे से आने वाली किसी भी आवाज पर भरोसा मत करना..."
डायरी का वह पन्ना वहीं खत्म हो गया। आरव का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। दादाजी, जो हमेशा तार्किक बातें करते थे, उन्होंने ऐसी खौफनाक बात क्यों लिखी? उस बंद कमरे में ऐसा क्या था?
आधी रात का सन्नाटा और वह सुरीली धुन
रात के ठीक बारह बजकर पांच मिनट हुए थे। बाहर हवा का शोर तेज हो गया था और बिजली अचानक चली गई। पूरे बंगले में केवल मोमबत्ती की पीली रोशनी कांप रही थी।
तभी, सन्नाटे को चीरती हुई एक बेहद धीमी और सुरीली धुन गूंजने लगी। कोई हारमोनियम पर एक उदास राग बजा रहा था और उसके साथ एक सुरीली, मगर दर्द से भरी आवाज में कोई गुनगुना रहा था। वह आवाज ठीक नीचे तहखाने की तरफ से आ रही थी।
आरव के कदम खुद-ब-खुद तहखाने की सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगे। डर की एक ठंडी लहर उसकी रीढ़ की हड्डी में दौड़ गई, लेकिन उसके दिल में छिपा अपनी जड़ों को जानने का भाव और उस रोती हुई आवाज के प्रति सहानुभूति उसे रोक नहीं पा रही थी। वह नीचे पहुँचा। सामने वही भारी, लोहे का पुराना दरवाजा था जिस पर बड़ा सा जंग लगा ताला लटका था।
आवाज ठीक उसी कमरे के भीतर से आ रही थी। आरव ने कांपते हाथों से ताला छुआ, पर वह तो पहले से ही खुला हुआ था! जैसे ही उसने दरवाजे को धक्का दिया, वह चीखते हुए खुल गया। अंदर पूरी तरह अंधेरा था, केवल चमेली के फूलों की तीव्र खुशबू फैली हुई थी।
आरव ने अपने फोन की टॉर्च जलाई। कमरे के बीचों-बीच एक कुर्सी रखी थी, जिस पर कोई बैठा हुआ था। उसकी पीठ आरव की तरफ थी। जैसे ही आरव ने कहा, "कौन है वहाँ?"...
वह कुर्सी धीरे-धीरे आरव की तरफ घूमने लगी। कुर्सी पर बैठी आकृति ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। टॉर्च की रोशनी में आरव ने जो देखा, उसकी कल्पना उसने सपने में भी नहीं की थी...
क्या आरव उस सच्चाई का सामना कर पाएगा? क्या था उस बंद कमरे का राज? जानने के लिए जुड़े रहिए हमारे साथ...
Comments
Post a Comment