पिछले भाग में कहानी एक महा-सस्पेंस पर रुकी थी, जहाँ पाताल का 500 साल पुराना शैतान 'कंकालासुर' कहर बरपाने के लिए पूरी तरह बाहर आ चुका था। उसे हराने वाली जादुई भस्म (राख) खूनी संदूक में थी, और संदूक को खोलने की चाबी (परदादा की तांबे की अंगूठी) को हमारा भुक्खड़ समोसा 'हाजमोला' समझकर खा चुका था! अब रमेश के सामने मौत खड़ी थी और चाबी समोसा के पेट में थी।
अध्याय 17: पेट में चाबी, सिर पर मौत
कंकालासुर ने अपनी लाल धधकती आँखों से रमेश को घूरा और ज़ोर से हँसा। उसकी हँसी से तहखाने की बची-खुची दीवारें भी दरकने लगीं।
रमेश ने हताश होकर नटवरलाल (भूत) की तरफ देखा, "भाई नटवरलाल! तुम तो भूत हो, दीवार के आर-पार जा सकते हो। अपना हाथ समोसा के पेट में डालकर वो अंगूठी निकाल लाओ ना!"
नटवरलाल ने डरते हुए कहा, "पागल है क्या? मैं भूत हूँ, डॉक्टर नहीं! और इसके पेट में जो खतरनाक गैस बन रही है ना, उससे मेरी बची-खुची आत्मा भी पिघल जाएगी!"
अध्याय 18: 200 साल पुराना 'कड़वा लड्डू'
तभी चुड़ैल चंद्रावती आगे आई। उसकी लाल आँखों में एक अजीब सी चमक थी। "पीछे हटो रमेश! मैं 200 साल पुरानी चुड़ैल हूँ, मुझे पता है कि इंसानों को उल्टी कैसे करवाते हैं।"
चंद्रावती ने हवा में अपना हाथ घुमाया। अचानक उसके हाथ में एक काला, बदबूदार और अजीब सा लड्डू प्रकट हो गया। उसमें से सड़े हुए करेले और छिपकली की पूंछ जैसी गंध आ रही थी।
उसने आँख बंद की और लड्डू मुँह में डालकर निगल लिया। एक सेकंड... दो सेकंड... तीन सेकंड...
अचानक समोसा का चेहरा हरा, फिर नीला, फिर लाल हो गया। उसका पेट ऐसे फूलने लगा जैसे कोई गुब्बारा हो। "ओह तेरी... ये क्या खिला दिया..." समोसा का मुँह खुला और एक भयानक डकार के साथ वह तांबे की अंगूठी गोली की रफ़्तार से उसके मुँह से बाहर निकली— *प्यूंक!*
अध्याय 19: जादुई भस्म और समोसा का 'सिक्सर'
अंगूठी हवा में उछली और सीधी जाकर उस 'खूनी संदूक' के गोल खांचे (Slot) में फिट हो गई। एक ज़ोरदार "क्लिक!" की आवाज़ हुई और संदूक का ढक्कन अपने आप खुल गया। संदूक के अंदर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।
"जादुई भस्म!" नटवरलाल चीखा।
रमेश ने छलांग लगाई और संदूक के अंदर से वह चमकीली भस्म अपनी मुट्ठी में भर ली। कंकालासुर को यह देखकर बहुत गुस्सा आया। उसने अपना कंकाली हाथ रमेश की तरफ मारा। रमेश टक्कर खाकर दूर जा गिरा और उसके हाथ से भस्म हवा में उड़ने लगी।
सब खत्म होने ही वाला था, लेकिन तभी...
समोसा ने तहखाने में पड़ी एक पुरानी झाड़ू उठाई और हवा में उड़ती हुई उस भस्म को क्रिकेट के बैट की तरह सीधे कंकालासुर के खुले हुए मुँह में शॉट मार दिया! "सिक्सर!"
भस्म सीधे शैतान के गले में जा गिरी।
कंकालासुर तड़पने लगा। जादुई भस्म के असर से उसके कंकाली शरीर में आग लग गई। वह भयानक दर्द से चीखता हुआ, धीरे-धीरे राख के ढेर में बदलने लगा। कुछ ही सेकंड में, वह 500 साल पुराना खूंखार शैतान पूरी तरह भस्म हो चुका था। तहखाने की ज़मीन जो फटी थी, वह अपने आप बंद हो गई।
अध्याय 20: हवेली की शांति (The End)
हवेली में अचानक एक अजीब सी शांति छा गई। लाल रोशनी गायब हो गई और तहखाने में सिर्फ रमेश की टॉर्च की रोशनी बची थी।
चुड़ैल चंद्रावती का डरावना रूप भी अब शांत हो चुका था। वह अब एक साधारण महिला की आत्मा जैसी लग रही थी। "धन्यवाद रमेश और समोसा। तुम दोनों ने आज सिर्फ अपनी ही नहीं, बल्कि हमारी भी जान (आत्मा) बचाई है।"
नटवरलाल (भूत) ने समोसा को गले लगा लिया, "भाई! तूने तो आज क्रिकेट के भगवान को फेल कर दिया। क्या शॉट मारा था तूने!"
रमेश ने उठते हुए कहा, "चलो अच्छा है, अब ये हवेली सुरक्षित है। लेकिन अब तुम दोनों भूतों का क्या होगा?"
रमेश मुस्कुराया। तभी समोसा, जिसका पेट अभी भी बज रहा था, संदूक के पास गया और बोला, "यार, इस संदूक में भस्म के नीचे कुछ और भी है!"
रमेश ने पास जाकर देखा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। जादुई भस्म के नीचे सोने के सिक्कों और आभूषणों से भरा हुआ एक गुप्त खजाना था, जो रमेश के परदादा ने छिपाया था!
रमेश ने अपना सिर पीट लिया और हँसने लगा। खूनी हवेली अब भूतों, खजाने और दो पागल दोस्तों की हंसी से गूंज रही थी।
समाप्त (The End)
इस तरह रमेश और समोसा ने न सिर्फ शैतान को हराया, बल्कि खूनी हवेली का खजाना भी जीत लिया।
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कहानी से जुड़े कुछ सवाल (Story FAQ)
कंकालासुर का अंत कैसे हुआ?
जब हवा में जादुई भस्म उड़ रही थी, तब समोसा ने गुस्से में एक पुरानी झाड़ू से भस्म को क्रिकेट की तरह शॉट मारा, जो सीधे शैतान के मुँह में जा गिरी और वह जलकर राख हो गया।
संदूक खोलने वाली अंगूठी समोसा के पेट से कैसे बाहर आई?
चुड़ैल चंद्रावती ने समोसा को 200 साल पुराना एक बदबूदार जादुई लड्डू खिलाया, जिसे खाते ही समोसा को उल्टी (डकार) आई और अंगूठी गोली की रफ़्तार से बाहर निकल गई।
अंत में रमेश और समोसा को क्या मिला?
शैतान के खात्मे के बाद, उन्हें उसी खूनी संदूक के नीचे परदादा का छिपाया हुआ सोने के सिक्कों और आभूषणों का एक बड़ा खजाना मिला।
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