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खूनी हवेली और वो 'नौटंकी' भूत: पाताल का शैतान और खूनी संदूक (भाग 4) | Horror Comedy

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि चुड़ैल चंद्रावती ने रमेश और समोसा को बताया कि हवेली में असली खतरा वह नहीं, बल्कि तहखाने के नीचे दबा 'मालिक' है। अचानक ज़मीन फट गई और एक विशालकाय काले धुएं वाले कंकाली हाथ ने समोसा का पैर पकड़ लिया। रमेश समोसा को खींचने की पूरी कोशिश कर रहा था, लेकिन वह शैतानी ताकत बहुत भारी पड़ रही थी।

अध्याय 13: समोसा का 'दांत-तोड़' वार

समोसा आधी खाई में लटक चुका था। नीचे घना अंधेरा था जिसमें से सड़े हुए अंडे और कई सौ साल पुरानी लहसुन जैसी भयानक बदबू आ रही थी। रमेश के हाथों से पसीना छूटने लगा और उसकी पकड़ कमज़ोर होने लगी।

"रमेश! मुझे छोड़ना मत भाई! मैंने अभी तक शहर वाले नए ढाबे की 'पनीर बटर मसाला' ट्राई नहीं की है... मैं ऐसे नहीं मर सकता!" समोसा रोते हुए चिल्लाया।

लेकिन वह विशालकाय हाथ समोसा को और तेज़ी से नीचे खींचने लगा। अचानक समोसा की नाक में उस हाथ से आती हुई भयानक बदबू घुसी। समोसा, जिसे खाने-पीने के अलावा किसी चीज़ से फर्क नहीं पड़ता था, उसे यह बदबू बर्दाश्त नहीं हुई।

समोसा ने आव देखा न ताव, उस विशालकाय और डरावने कंकाली हाथ पर अपने पूरे दांत गड़ा दिए और ज़ोर से काट लिया! "छी! कितने सालों से साबुन नहीं लगाया तूने?"

अजीब बात यह थी कि उस शैतानी हाथ ने दर्द से एक भयानक चीख मारी— "आआआआहहह!" और समोसा का पैर छोड़ दिया। रमेश ने मौका देखते ही समोसा को पूरी ताकत से ऊपर खींच लिया। दोनों दूर जाकर फर्श पर गिर पड़े।

अध्याय 14: भूतों की 'ग्रांड एंट्री'

गहरी खाई से अब लाल धुएं के साथ आग की लपटें बाहर आने लगीं। ऐसा लग रहा था कि शैतान अब पूरी तरह बाहर आने वाला है। रमेश और समोसा ने अपनी आँखें बंद कर लीं, लेकिन तभी उनके सामने हवा में एक धमाका हुआ।

चुड़ैल चंद्रावती और नटवरलाल (डरपोक भूत) वापस आ गए थे! चंद्रावती के हाथ में एक पुरानी तलवार थी और नटवरलाल के हाथ में... एक ईंट!

"हम इस हवेली को छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे! यह हमारा घर है!" चुड़ैल चंद्रावती ने गरजते हुए कहा।

नटवरलाल ने भी जोश में आकर कहा, "बिल्कुल सही! मैं यहाँ पिछले 100 सालों से रेंट (Rent) फ्री रह रहा हूँ। मैं किसी नए शैतान को अपना कब्ज़ा नहीं करने दूँगा!" यह बोलते हुए नटवरलाल ने जोश में ईंट खाई की तरफ फेंकी, लेकिन वह ईंट गलती से उछलकर रमेश के सिर पर लग गई।

"अबे अंधे भूत! शैतान उधर है!" रमेश ने सिर सहलाते हुए चिल्लाया।

अध्याय 15: शैतान 'कंकालासुर' का उदय

अचानक खाई से एक गगनभेदी गर्जना हुई। एक विशालकाय शरीर हवा में उठा। यह 'कंकालासुर' था— एक 15 फुट लंबा प्राचीन शैतान, जिसके शरीर पर मांस नहीं बल्कि सिर्फ काली हड्डियां थीं। उसके सिर पर सींग थे और आँखों में आग जल रही थी।

"मूर्ख इंसानों और तुच्छ आत्माओं! मैं कंकालासुर हूँ! 500 सालों की कैद के बाद आज मैं आज़ाद हुआ हूँ। आज मैं तुम सबकी आत्माओं को निगल कर अमर हो जाऊंगा!"
कंकालासुर की आवाज़ से पूरी हवेली हिलने लगी। दीवारें दरकने लगीं और छत से पत्थर गिरने लगे। चुड़ैल चंद्रावती की ताकत भी उस शैतान के सामने फीकी पड़ रही थी। वह शैतान इतना खूंखार था कि मौत भी उससे खौफ खाती।

तभी समोसा ने शैतान की तरफ घूरते हुए कहा...

"ओए कंकाल के ढांचे! आत्माएं तो तू बाद में निगलेगा, पहले जाके डेंटिस्ट को दिखा। तेरे पीले दांतों से इतनी बदबू आ रही है कि मेरा हाजमा खराब हो गया। माउथवॉश का नाम सुना है कभी?"

कंकालासुर, जो 500 सालों से सिर्फ लोगों को डराता आया था, इस बेइज्जती से एकदम सुन्न पड़ गया। "क्या? मेरी... मेरी बदबू?"

चुड़ैल चंद्रावती ने मौका देखा और चिल्लाई, "रमेश! उसे बातों में उलझा कर रखो। उसे हराने का सिर्फ एक ही तरीका है... वो खूनी संदूक!"

अध्याय 16: खूनी संदूक का रहस्य (क्लाइमेक्स की शुरुआत)

रमेश की नज़र तहखाने के उस कोने में गई जहाँ वह पुराना लकड़ी का संदूक रखा था (जिसे उन्होंने पार्ट 1 में देखा था)। उस पर खून से लिखा था— "इसे कभी मत खोलना"

"वो चेतावनी दूसरों के लिए थी रमेश! उस संदूक में ही वो जादुई भस्म (राख) है जो इस शैतान को वापस पाताल में भेज सकती है। जल्दी उसे खोलो!" नटवरलाल ने दूर से छिपते हुए चिल्लाकर कहा।

कंकालासुर को उनकी योजना समझ आ गई। उसने एक भयानक दहाड़ मारी और अपना विशालकाय पैर रमेश की तरफ बढ़ाया। रमेश अपनी जान की परवाह किए बिना संदूक की तरफ कूदा।

रमेश ने संदूक का ताला तोड़ने की कोशिश की, लेकिन ताले में कोई चाबी लगाने की जगह ही नहीं थी। बल्कि ताले के ऊपर एक गोल खांचा (Slot) बना हुआ था, जो बिल्कुल किसी सिक्के या अंगूठी के आकार का था।

संदूक के ऊपर अचानक लाल चमक के साथ कुछ शब्द उभर कर सामने आए...

"यह संदूक तभी खुलेगा, जब इसमें 'शांतिपुर' के असली वारिस का खून और वो प्राचीन निशानी रखी जाएगी।"

रमेश को अचानक याद आया! उसके परदादा ने वसीयत के साथ उसे एक पुरानी तांबे की अंगूठी दी थी। रमेश ने जल्दी से अपनी जेब में हाथ डाला, लेकिन... उसकी जेब खाली थी!

रमेश का चेहरा पीला पड़ गया। "समोसा! मेरी परदादा वाली अंगूठी कहाँ है?"

समोसा ने शैतान से बचते हुए पीछे मुड़कर देखा और बड़ी मासूमियत से बोला, "अरे भाई! वो तांबे की गोल चीज़? मुझे लगा वो हाजमोला की पुरानी गोली है... मैं तो उसे हवेली के गेट पर ही चबा कर निगल गया था!"

महा-सस्पेंस (क्या होगा अंतिम भाग में?)

कंकालासुर का हमला अब रमेश पर होने वाला है! संदूक खोलने की चाबी (अंगूठी) समोसा के पेट में है! अब रमेश उस संदूक को कैसे खोलेगा? क्या समोसा का पेट फाड़ना पड़ेगा या हवेली में आज सबकी मौत तय है?

इस पागलपन, डर और हंसी से भरी कहानी का अंतिम भाग (Part 5: The Grand Finale) जल्द ही आ रहा है! जुड़ें रहें!

कहानी से जुड़े कुछ सवाल (Story FAQ)

तहखाने के नीचे कौन सा शैतान छुपा था?

तहखाने के नीचे 500 साल पुराना प्राचीन और खूंखार शैतान 'कंकालासुर' कैद था, जो अब आज़ाद हो चुका है और सबकी आत्माओं को निगलना चाहता है।

समोसा ने विशालकाय हाथ से खुद को कैसे बचाया?

जब हाथ से बहुत गंदी बदबू आने लगी, तो समोसा को गुस्सा आ गया और उसने अपने नुकीले दांतों से उस कंकाली हाथ पर ज़ोर से काट लिया, जिससे शैतान ने दर्द से उसे छोड़ दिया।

कंकालासुर को कैसे हराया जा सकता है?

उसे हराने का एक ही रास्ता है 'खूनी संदूक', जिसके अंदर जादुई भस्म रखी है। लेकिन उसे खोलने की चाबी (अंगूठी) समोसा गलती से निगल चुका है! यह सस्पेंस भाग 5 में सुलझेगा।

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