रमेश बाबू का ऑटोमैटिक हेयर ड्रायर और गंजेपन का गजब का रायता: एक देसी मजेदार कहानी

जिंदगी में अगर हँसना है, तो किसी मिडिल क्लास इंसान के जुगाड़ देख लीजिए। हमारे मोहल्ले के रमेश बाबू ऐसे ही एक अजीबो-गरीब प्राणी थे। उम्र पचास के पार, बाल सिर से गायब और चेहरे पर हमेशा एक ऐसा तेज रहता था मानो आइंस्टीन के छोटे भाई हों। रमेश बाबू को सोशल मीडिया रील्स देखने की नई-नई बीमारी लगी थी। एक दिन उन्होंने फेसबुक पर एक विज्ञापन देखा—'जादुई हेयर ग्रोथ और ऑटोमैटिक हेयर ड्रायर कैप! सिर्फ सात दिन में घने बाल, वरना पैसे वापस।' फिर क्या था, रमेश बाबू के भीतर का सोया हुआ युवा जाग उठा।

जब ऑनलाइन शॉपिंग ने किया बड़ा खेला

रमेश बाबू ने बिना सोचे-समझे अपनी गाढ़ी कमाई के दो हजार रुपये उस चाइनीज कंपनी के उस अजीब से हेलमेट नुमा गैजेट पर खर्च कर दिए, जिसे कंपनी 'स्मार्ट स्कैल्प मसाजर और ड्रायर' कह रही थी। तीन दिन बाद एक बड़ा सा डिब्बा उनके घर पहुँचा। डिब्बे को खोलकर रमेश बाबू ऐसे खुश हुए जैसे उन्हें कोई नोबेल प्राइज मिल गया हो। उस गैजेट में अजीब-अजीब से तार, एक छोटी सी मोटर और गर्म हवा फेंकने वाले छोटे-छोटे पंखे लगे थे।

रमेश बाबू ने सोचा कि अगर इसे रातभर सिर पर पहनकर सोया जाए, तो शायद सुबह तक अमिताभ बच्चन जैसे बाल आ जाएंगे। उन्होंने अपनी पत्नी सुशीला को चेतावनी दे दी—"आज रात कोई disturbance नहीं चाहिए, साइंस अपना काम करेगी!" सुशीला जी ने आँखें मकाईं और बोलीं, "बाल आएँ या न आएँ, कहीं खोपड़ी में शार्ट सर्किट हो गया तो पूरा मोहल्ला ठंडा पड़ जाएगा।" लेकिन रमेश बाबू अपनी जिद के पक्के थे।

रात का सन्नाटा और ऑटोमैटिक ड्रायर का तांडव

रात के ठीक दो बजे थे। पूरा मोहल्ला गहरी नींद में था। रमेश बाबू ने चुपचाप वो जादुई कैप अपने गंजे सिर पर पहनी और उसका प्लग बोर्ड में लगा दिया। शुरुआत में तो सब ठीक रहा, हल्की-हल्की गर्माहट मिलने लगी जिससे रमेश बाबू को गहरी नींद आ गई। लेकिन टेक्नोलॉजी अपनी मर्जी से चलती है, खासकर सस्ते माल वाली।

रात के ढाई बजे उस गैजेट का 'ऑटोमैटिक सेंसर' खराब हो गया। मशीन ने समझा कि सिर पर बाल बहुत घने हो गए हैं और उन्हें सुपर-फास्ट सुखाने की जरूरत है। मशीन ने हीटिंग और ब्लोअर की स्पीड को मैक्सिमम पर सेट कर दिया। अचानक रमेश बाबू की नींद एक जोरदार झटके से खुली। उनका सिर किसी माइक्रोवेव ओवन की तरह तप रहा था और सिर पर रखी वो कैप सीटी मारने लगी थी।

पड़ोसियों की एंट्री और कॉमेडी का क्लाइमैक्स

रमेश बाबू ने बिस्तर से छलांग लगाई और कैप को उतारने की कोशिश की, लेकिन उसके क्लिप्स उनके कानों के पास फँस चुके थे। वो घर में चीखते हुए भागने लगे—"बचाओ! मेरा सिर भुट्टा बन रहा है!" उनकी चीखें सुनकर सुशीला जी की नींद खुली। उन्होंने तुरंत मेन स्विच ऑफ किया, तब जाकर उस मशीन का दम निकला। लेकिन तब तक रमेश बाबू का गंजा सिर पूरी तरह टमाटर की तरह लाल हो चुका था और उसमें से धुआँ निकल रहा था।

आवाज सुनकर ऊपर वाले शर्मा जी डंडे के साथ नीचे आ गए, यह सोचते हुए कि घर में कोई चोर घुस आया है। जब उन्होंने रमेश बाबू का यह हाल देखा, तो उनकी हँसी छूट गई। शर्मा जी ने हँसते हुए कहा, "रमेश भाई, बाल उगाने चले थे, पापड़ सेकने की मशीन बना दी सिर को!"

निष्कर्ष

अगले दिन रमेश बाबू ने वो जादुई कैप कचरे के डिब्बे में फेंक दी और कसम खाई कि अब जिंदगी में कभी ऑनलाइन ब्यूटी या हेयर प्रोडक्ट नहीं खरीदेंगे। आज भी मोहल्ले में जब कोई नया गैजेट आता है, तो लोग रमेश बाबू से सलाह लेने जरूर जाते हैं। इस मजेदार घटना ने हमें सिखा दिया कि शॉर्टकट के चक्कर में अक्सर सिर के बाल भले न आएँ, पर हँसी के ठहाके जरूर पक्के हो जाते हैं।

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